“खरीदी व्यवस्था के दावे पूरी तरह खोखले..” दमोह खराब गेहूं की गूंज भोपाल तक, कांग्रेस ने मोहन सरकार को घेरा, पढ़ें पूरी खबर

“खरीदी व्यवस्था के दावे पूरी तरह खोखले..” दमोह खराब गेहूं की गूंज भोपाल तक, कांग्रेस  ने मोहन सरकार को घेरा, पढ़ें पूरी खबर

MP Damoh News: दमोह। समर्थन मूल्य पर खरीदे गए गेहूं की गुणवत्ता को लेकर दमोह जिला एक बार फिर सुर्खियों में है। टीकमगढ़ जिले के बड़ोराघाट वेयरहाउस में दमोह से भेजे गए हजारों क्विंटल गेहूं की जांच के दौरान गंभीर अनियमितताएं सामने आने के बाद मामला अब प्रशासनिक दायरे से निकलकर राजनीतिक गलियारों तक पहुंच गया है। निरीक्षण में गेहूं की बोरियों में जीवित कीड़े, घुन, मिट्टीयुक्त दाने, नमी से प्रभावित, सड़ा-गला और बदबूदार अनाज मिलने पर करीब 3132 क्विंटल गेहूं वापस दमोह लौटा दिया गया है।

मामले ने सरकारी खरीदी व्यवस्था, गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खास बात यह है कि दमोह में यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी हजारों क्विंटल गेहूं गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतरने के कारण रिजेक्ट किया जा चुका है।

6265 बोरियों में मिला खराब गेहूं

जानकारी के अनुसार टीकमगढ़ के बड़ोराघाट वेयरहाउस में दमोह जिले से भेजी गई 6265 बोरियों की जांच की गई। निरीक्षण के दौरान बड़ी मात्रा में गेहूं अमानक पाया गया। जांच रिपोर्ट में कई बोरियों में जीवित कीड़े और घुन मिलने की बात सामने आई, जबकि कई जगह दाने सड़े-गले, मिट्टीयुक्त, नमी से प्रभावित और बदबूदार पाए गए।

वेयरहाउस प्रबंधन ने ऐसे अनाज को भंडारण के लिए अनुपयुक्त मानते हुए तत्काल वापस भेजने का निर्णय लिया। इसके बाद लगभग 3132 क्विंटल गेहूं दमोह लौटा दिया गया।

15 दिनों में पहुंचा था 8700 मीट्रिक टन गेहूं

सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष दमोह जिले में समर्थन मूल्य पर 18 लाख 95 हजार क्विंटल से अधिक गेहूं खरीदा गया है। 19 मई से 2 जून के बीच मात्र 15 दिनों में करीब 8700 मीट्रिक टन गेहूं टीकमगढ़ के विभिन्न भंडारण केंद्रों तक पहुंचाया गया था।

इसी दौरान हुए निरीक्षण में बड़ी मात्रा में अमानक अनाज मिलने से पूरी खरीदी और भंडारण प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई है।

पहले भी रिजेक्ट हो चुका है 23 हजार क्विंटल से ज्यादा गेहूं

दमोह जिले में यह कोई नया मामला नहीं है। इससे पहले भी 23 हजार क्विंटल से अधिक गेहूं विभिन्न स्तरों पर रिजेक्ट किया जा चुका है। इसमें भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) द्वारा अस्वीकृत किया गया गेहूं भी शामिल है।

लगातार सामने आ रहे मामलों से यह संकेत मिल रहा है कि खरीदी केंद्रों पर गुणवत्ता जांच और निगरानी की व्यवस्था में गंभीर खामियां मौजूद हैं।

आखिर खरीदी केंद्रों पर जांच हुई या नहीं?

पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब समर्थन मूल्य पर खरीदे जाने वाले गेहूं की गुणवत्ता जांच खरीदी केंद्रों पर ही की जाती है, तो इतनी बड़ी मात्रा में खराब अनाज वेयरहाउस तक पहुंच कैसे गया?

यदि टीकमगढ़ में निरीक्षण के दौरान कीड़े, घुन और सड़ा हुआ अनाज आसानी से पकड़ में आ गया, तो दमोह के खरीदी केंद्रों, सर्वेयरों और भंडारण स्थलों पर तैनात अधिकारियों की नजर इस पर क्यों नहीं पड़ी?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जांच प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और प्रभावी होती, तो हजारों क्विंटल अमानक अनाज भंडारण केंद्र तक पहुंच ही नहीं पाता।

इन खरीदी केंद्रों से पहुंचा था विवादित गेहूं

जांच में जिन ट्रकों से खराब गेहूं मिला, वे दमोह जिले के कई खरीदी केंद्रों से लोड होकर टीकमगढ़ पहुंचे थे। इनमें पटेरिया, सिंगपुर, कुम्हारी, पड़री सहजपुर, मड़ियादो, सिंग्रामपुर, माडनखेड़ा, घटेरा, बनवार, राजलवारी, टिकरी पिपरिया, जालिमसिमरी, जबेरा, अंजनी बेलखेड़ी, बांसातारखेड़ा, खमरिया बिजौरा, कुणडलपुर, चंपत पिपरिया, रोंड और मौसीपुरा सहित कई केंद्र शामिल हैं।

अब इन सभी केंद्रों पर हुई गुणवत्ता जांच की प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।

टीकमगढ़ कलेक्टर का साफ संदेश

टीकमगढ़ कलेक्टर विवेक श्रोत्रिय ने स्पष्ट किया है कि जिले में बिना गुणवत्ता जांच के किसी भी अनाज का भंडारण नहीं किया जा रहा है।

उन्होंने कहा, बिना जांच एक भी बोरी का भंडारण नहीं किया जा रहा है। जो गेहूं खराब मिला है, उसे वापस भेजा गया है। पूरे मामले की जानकारी दमोह कलेक्टर को भी दे दी गई है।अब देखना होगा कि दमोह कलेक्टर इस मामले में क्या प्रतिक्रिया देते हैं।

राजनीतिक रंग भी पकड़ने लगा मामला

गेहूं विवाद अब राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री मोहन यादव पर निशाना साधा है।

जीतू पटवारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि, मुख्यमंत्री जी, यह दो कौड़ी की सरकारी लूट कब बंद होगी? उन्होंने सरकारी खरीदी व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी पर सवाल खड़े किए।

वहीं विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी सरकार को घेरते हुए कहा कि मध्य प्रदेश में किसानों की मेहनत और सरकारी खरीदी व्यवस्था दोनों पर घुन लग चुका है।

उन्होंने आरोप लगाया कि किसानों की मेहनत की उपज यदि वेयरहाउसों में सड़ रही है तो यह सरकार की खरीदी व्यवस्था और कृषि प्रबंधन की विफलता को दर्शाता है।

जांच और जवाबदेही की मांग तेज

अब किसानों, सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों की ओर से पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग उठ रही है। सवाल यह भी है कि क्या नए गेहूं में पुराने और खराब अनाज की मिलावट की गई थी? यदि ऐसा हुआ है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

इसके साथ ही यह मांग भी उठ रही है कि संबंधित खरीदी केंद्रों, सर्वेयरों, वेयरहाउस संचालकों, परिवहन एजेंसियों और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कर जवाबदेही तय की जाए।

फिलहाल पूरे मामले पर दमोह प्रशासन की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शासन और प्रशासन इस मामले में क्या कार्रवाई करता है और क्या दोषियों के खिलाफ ठोस कदम उठाए जाते हैं या यह मामला भी अन्य विवादों की तरह समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा।


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