Bilaspur News : महिला आयोग मुआवजा तय या FIR का आदेश नहीं दे सकता, हाईकोर्ट ने तीन आदेश किए रद्द

Bilaspur News : महिला आयोग मुआवजा तय या FIR का आदेश नहीं दे सकता, हाईकोर्ट ने तीन आदेश किए रद्द

Chhattisgarh Bilaspur News : बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि राज्य महिला आयोग की भूमिका मुख्य रूप से सलाह देने और संबंधित अधिकारियों को सिफारिश करने तक सीमित है। आयोग पक्षकारों के अधिकार और दायित्व तय नहीं कर सकता और न ही मुआवजा बढ़ाने, FIR दर्ज कराने या किसी विकास परियोजना का काम रोकने जैसे बाध्यकारी आदेश जारी कर सकता है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड यानी गेल की याचिका पर सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग के 19 जून 2025, 6 जुलाई 2026 और 8 जुलाई 2026 के आदेशों को अधिकार क्षेत्र से बाहर मानते हुए निरस्त कर दिया। कोर्ट ने गेल की रिट याचिका स्वीकार कर ली।

दरअसल, गेल ने हाईकोर्ट में दायर याचिका में बताया था कि पेट्रोलियम एवं मिनरल्स पाइपलाइंस (भूमि में उपयोग के अधिकार का अधिग्रहण) अधिनियम, 1962 के तहत संबंधित जमीन पर गैस पाइपलाइन बिछाने के लिए वैधानिक प्रक्रिया पूरी की गई थी। सक्षम प्राधिकारी की ओर से मुआवजा भी निर्धारित किया जा चुका था। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए मुआवजा बढ़ाने और संबंधित महिला को क्षतिपूर्ति देने के निर्देश दिए थे।

आयोग ने संबंधित अधिकारी के खिलाफ FIR दर्ज कराने की बात भी कही थी और गैस पाइपलाइन बिछाने का काम रोकने का निर्देश दिया था। गेल ने इन आदेशों को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में कहा कि महिला आयोग को इस तरह के बाध्यकारी आदेश जारी करने का वैधानिक अधिकार नहीं है।

हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य महिला आयोग को मुख्य रूप से सलाहकारी और सिफारिशी शक्तियां प्रदान की गई हैं। आयोग महिलाओं से जुड़े मामलों में शिकायत प्राप्त कर संबंधित अधिकारियों के समक्ष उचित उपचारात्मक कार्रवाई के लिए मामला उठा सकता है, लेकिन उसे पक्षकारों के अधिकारों और दायित्वों का न्यायिक निर्धारण करने का अधिकार नहीं है।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के भवानी प्रसाद जेना बनाम उड़ीसा राज्य महिला आयोग मामले में दिए गए फैसले का भी हवाला दिया। इसमें स्पष्ट किया गया था कि महिला आयोग महिलाओं के अधिकारों के संरक्षण के लिए संबंधित अधिकारियों से उपचारात्मक कदम उठाने को कह सकता है, लेकिन विवाद का न्यायिक फैसला करने का अधिकार उसके पास नहीं है।

हाईकोर्ट ने हाल में सुप्रीम कोर्ट के मुंबई पोर्ट अथॉरिटी बनाम नेशनल कमीशन फॉर शेड्यूल्ड कास्ट्स मामले में दिए फैसले का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि किसी आयोग को दस्तावेज मंगाने और साक्ष्य लेने की शक्ति दिए जाने का मतलब यह नहीं है कि वह उन साक्ष्यों के आधार पर बाध्यकारी आदेश पारित कर सकता है। आयोग तथ्यों का पता लगाकर संबंधित सरकार से कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है, लेकिन इससे उसे न्यायिक अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में महिला आयोग ने अपने आदेशों के जरिए पक्षकारों के अधिकार और दायित्व निर्धारित करने के साथ ऐसी कार्रवाई के निर्देश भी दिए, जो सक्षम वैधानिक प्राधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में आती है। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि आयोग ने अपनी वैधानिक शक्तियों की सीमा पार की है।

कोर्ट ने यह भी माना कि मामले में राज्य या आयोग से जवाब का इंतजार करना उपयोगी नहीं होगा। इसके बाद हाईकोर्ट ने महिला आयोग के तीनों आदेशों—19 जून 2025, 6 जुलाई 2026 और 8 जुलाई 2026—को अधिकार क्षेत्र से बाहर और कानूनन अस्थिर मानते हुए निरस्त कर दिया। साथ ही गेल की रिट याचिका स्वीकार कर ली गई।


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