Narayanpur News: कभी काले झंडे का फरमान, अब तिरंगे की शान, अबूझमाड़ के बोटेर में बदली तस्वीर

Narayanpur News: कभी काले झंडे का फरमान, अब तिरंगे की शान, अबूझमाड़ के बोटेर में बदली तस्वीर

Chhattisgarh Narayanpur News: नारायणपुर। अबूझमाड़ के घने जंगलों के बीच बसे बोटेर गांव में इस बार स्वतंत्रता दिवस का नजारा ऐतिहासिक रहा। जहां कभी तिरंगा फहराना तो दूर, आजादी का जश्न मनाने की कल्पना करना भी ग्रामीणों के लिए मुश्किल था, वहीं पहली बार गांव में पूरे सम्मान के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। आईटीबीपी 29वीं वाहिनी के जवानों के साथ ग्रामीणों और बच्चों ने तिरंगा हाथ में लेकर देशभक्ति के नारों के बीच आजादी का जश्न मनाया।

बोटेर और गुंडेकोट कभी नक्सलियों के मजबूत प्रभाव वाले इलाकों में गिने जाते थे। ग्रामीणों की जिंदगी नक्सलियों के फरमानों के साये में गुजरती थी। गांव से बाहर जाने से लेकर आने-जाने तक के लिए अनुमति की जरूरत पड़ती थी। राष्ट्रीय पर्व के दौरान तिरंगे की जगह काला झंडा लगाने का फरमान जारी किया जाता था। तिरंगा फहराने की कोशिश करने वालों को हिंसा का सामना करना पड़ता था, जिसके चलते वर्षों तक ग्रामीणों के मन में डर बना रहा।

समय के साथ इलाके की तस्वीर बदलने लगी। 21 मई 2025 को ऑपरेशन कगार के तहत सुरक्षाबलों ने क्षेत्र में बड़ा अभियान चलाया। करीब 50 घंटे तक चले अभियान में नक्सल संगठन के महासचिव और डेढ़ करोड़ रुपये के इनामी नक्सली नेता केशव राव उर्फ बसवराजू समेत 27 नक्सली मारे गए। इसके बाद इलाके में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हुई और नया पुलिस कैंप स्थापित किया गया। कैंप की स्थापना के साथ ही ग्रामीणों के भीतर वर्षों से बैठा नक्सलियों का खौफ धीरे-धीरे कम होने लगा।

जिस इलाके में कभी बंदूक की आवाज ग्रामीणों की जिंदगी का हिस्सा थी, वहां अब बच्चों की खिलखिलाहट सुनाई देने लगी है। जिन रास्तों पर कभी नक्सलियों का पहरा रहता था, वहां अब ग्रामीण सुरक्षाबलों के साथ बेखौफ होकर आगे बढ़ रहे हैं। इसी बदलाव की तस्वीर स्वतंत्रता दिवस पर बोटेर में देखने को मिली।

आईटीबीपी 29वीं वाहिनी के जवानों के साथ ग्रामीणों ने पूरे उत्साह के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाया। नन्हे बच्चों ने हाथों में तिरंगा थामा और देशभक्ति के नारों के साथ खुशी जताई। ग्रामीणों के चेहरों पर नक्सल खौफ की जगह आजादी और सुरक्षा का भरोसा नजर आया। बोटेर में लहराता तिरंगा उन वर्षों के डर पर जीत का प्रतीक बना, जब राष्ट्रीय पर्व भी ग्रामीणों के लिए भय का दिन हुआ करता था।

बोटेर के ग्रामीणों के लिए यह स्वतंत्रता दिवस सिर्फ एक राष्ट्रीय पर्व नहीं, बल्कि बदलते समय और नई उम्मीदों का उत्सव रहा। वर्षों तक बंदूक की छाया में रहने वाले ग्रामीणों को अब विकास, सुरक्षा और बेहतर भविष्य की उम्मीद दिखाई दे रही है।


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