Bilaspur News: बिलासपुर। बिलासपुर नगर निगम द्वारा शहर के विकास, रोजगार सृजन और राजस्व बढ़ाने के उद्देश्य से करोड़ों रुपये खर्च कर तैयार किए गए कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट अब नगर निगम के बजाय निजी संस्थाओं के लिए कमाई का माध्यम बन गए हैं। शहर के तारामंडल, ऑडिटोरियम, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, स्टेडियम और अन्य महत्वपूर्ण परिसंपत्तियों को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत निजी संस्थाओं को सौंपे जाने से नगर निगम की कार्यप्रणाली और वित्तीय योजना पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
बिना आर्थिक अध्ययन के खर्च किए गए करोड़ों रुपये
जानकारी के अनुसार, नगर निगम के पास बड़े प्रोजेक्ट्स की आर्थिक व्यवहार्यता का आकलन करने के लिए कोई वित्तीय सलाहकार या फाइनेंशियल कंसल्टेंट नहीं है। नियमानुसार किसी भी बड़े निर्माण कार्य से पहले विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (DPR) तैयार किया जाना चाहिए, जिसमें निर्माण लागत, संभावित आय, संचालन एवं रखरखाव का खर्च और आवश्यक मानव संसाधन का पूरा आकलन किया जाता है।
लेकिन आरोप है कि इन नियमों की अनदेखी करते हुए सरकारी फंड खर्च करने की जल्दबाजी में करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट तो बना दिए गए, पर उनके संचालन और आय के मॉडल पर पर्याप्त योजना नहीं बनाई गई।
संचालन में असफल रहा निगम, अब निजी हाथों में संपत्तियां
निर्माण पूरा होने के बाद नगर निगम इन परिसंपत्तियों का प्रभावी संचालन नहीं कर सका। इसके बाद इन संपत्तियों को पीपीपी मॉडल के तहत निजी संस्थाओं को सौंप दिया गया। आलोचकों का कहना है कि इससे नगर निगम को मिलने वाला संभावित राजस्व अब निजी कंपनियों के पास जा रहा है।
बताया जा रहा है कि एपीजे अब्दुल कलाम तारामंडल, लखीराम ऑडिटोरियम, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, मिनी खेल स्टेडियम, राजा रघुराज सिंह स्टेडियम, बैडमिंटन कोर्ट, जुम्बा क्लास के लिए भवन, खेल परिसर की इमारत, बंधवापारा तालाब सहित कई परिसंपत्तियां निजी संचालन के लिए दी जा चुकी हैं।
अरपा नदी किनारे की जमीन को लेकर भी सवाल
विवाद केवल भवनों तक सीमित नहीं है। आरोप है कि शहर की जीवनरेखा मानी जाने वाली अरपा नदी के किनारे स्थित बहुमूल्य सरकारी भूमि भी एक निजी कंपनी को बेहद कम वार्षिक किराए पर उपलब्ध करा दी गई।
नगर निगम द्वारा पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किए गए रिवर व्यू (अटल परिसर) परियोजना के अंतर्गत अरपा नदी के किनारे की जमीन हैदराबाद की एक कंपनी को लगभग 11 लाख रुपये वार्षिक किराए पर दिए जाने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि कंपनी वहां अपना व्यावसायिक इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित कर रही है।
राजस्व बढ़ने के बजाय आर्थिक संकट गहराया
आलोचकों का कहना है कि जिन परियोजनाओं से नगर निगम को नियमित आय प्राप्त होनी चाहिए थी, उनका आर्थिक लाभ अब निजी संस्थाओं को मिल रहा है। इसका असर निगम की वित्तीय स्थिति पर भी पड़ा है। हालात ऐसे हैं कि अरबों रुपये की परिसंपत्तियां होने के बावजूद नगर निगम आज भी कर्मचारियों के वेतन के लिए राज्य सरकार के अनुदान पर निर्भर है।
‘फंड खर्च करने की होड़’ का आरोप
नगर निगम के तकनीकी अधिकारियों और इंजीनियरों पर आरोप है कि उन्होंने केवल उपलब्ध सरकारी फंड का उपयोग करने पर ध्यान दिया, जबकि परियोजनाओं के दीर्घकालिक संचालन, रखरखाव और आय के स्रोतों पर पर्याप्त योजना नहीं बनाई। वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि बिना आर्थिक योजना के बनाए गए बड़े प्रोजेक्ट अंततः स्थानीय निकायों पर वित्तीय बोझ बन जाते हैं।
निजीकरण पर उठ रहे सवाल
नगर निगम की संपत्तियों के निजी संचालन को लेकर अब शहर में बहस तेज हो गई है। एक पक्ष इसे परिसंपत्तियों के बेहतर प्रबंधन का माध्यम बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे सार्वजनिक संसाधनों के निजीकरण और निगम के संभावित राजस्व के नुकसान के रूप में देख रहा है। इस बीच शहरवासियों और कई सामाजिक संगठनों ने पूरे मामले की पारदर्शी समीक्षा, PPP समझौतों की जांच और नगर निगम की वित्तीय कार्यप्रणाली का स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग उठाई है।

