CG High Court on Prayer Meeting: बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने जांजगीर-चांपा जिले के गोधना गांव में घर में आयोजित प्रार्थना सभा से जुड़े मामले में राज्य सरकार को अंतरिम राहत प्रदान करते हुए एकलपीठ के आदेश के प्रभाव और उसके क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने यह आदेश राज्य सरकार की ओर से दायर रिट अपील पर सुनवाई के दौरान पारित किया।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता बिना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति लिए अपने घर में बड़ी संख्या में लोगों को एकत्र कर प्रार्थना सभा आयोजित कर रहे थे। सरकार का तर्क था कि छत्तीसगढ़ सार्वजनिक धार्मिक भवन तथा स्थान विनियमन अधिनियम, 1984 के तहत इस प्रकार की सभा के लिए पूर्व अनुमति आवश्यक है। इसके बावजूद एकलपीठ ने संबंधित नोटिसों को निरस्त करते हुए याचिका स्वीकार कर ली थी।
सरकार ने यह भी अदालत के समक्ष रखा कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 130 के तहत कार्रवाई की गई थी। सितंबर 2025 में उन्हें गिरफ्तार किया गया था और बाद में निजी मुचलके पर रिहा कर दिया गया। इसके अलावा भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 299 के तहत धर्मांतरण से संबंधित अपराध दर्ज किए गए हैं और इस मामले में चार्जशीट भी प्रस्तुत की जा चुकी है। फिलहाल मामला जुलाई 2026 में आरोप तय किए जाने के लिए लंबित है।
वहीं, याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि छत्तीसगढ़ सार्वजनिक धार्मिक भवन तथा स्थान विनियमन अधिनियम, 1984 इस मामले में लागू नहीं होता। उन्होंने अपने पक्ष के समर्थन में विभिन्न उच्च न्यायालयों के फैसलों का भी हवाला दिया और कहा कि निजी आवास में आयोजित प्रार्थना सभा को इस कानून के दायरे में नहीं लाया जा सकता।
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने पाया कि एकलपीठ ने बिना विस्तृत जवाब-तलब और दोनों पक्षों के बीच पर्याप्त प्रतिवाद के ही याचिका स्वीकार कर ली थी। इसके अलावा अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि वर्ष 1984 के इस अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक अन्य याचिका भी हाईकोर्ट में विचाराधीन है।
इन परिस्थितियों को देखते हुए डिवीजन बेंच ने 24 मार्च 2026 को पारित एकलपीठ के आदेश के प्रभाव और संचालन को अगली सुनवाई तक स्थगित कर दिया। अब इस मामले में आगे की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलों और लंबित संवैधानिक याचिका के पहलुओं को ध्यान में रखते हुए फैसला लिया जाएगा।

