Bastar Latest News: बस्तर के 116 नेताओं की सुरक्षा में कटौती, महेंद्र कर्मा परिवार समेत भाजपा-कांग्रेस के कई दिग्गजों की सुरक्षा श्रेणी बदली

Bastar Latest News: बस्तर के 116 नेताओं की सुरक्षा में कटौती, महेंद्र कर्मा परिवार समेत भाजपा-कांग्रेस के कई दिग्गजों की सुरक्षा श्रेणी बदली

Chhattisgarh Bastar News: बस्तर। कभी नक्सली हिंसा के कारण बस्तर में नेताओं और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा के लिए बड़ा सुरक्षा घेरा तैनात रहता था। राजनीतिक कार्यक्रमों से लेकर उनके आवास तक सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी रहती थी। झीरम घाटी में बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा की हत्या और भाजपा विधायक भीमा मंडावी की नक्सली हमले में मौत जैसी घटनाओं ने क्षेत्र की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था को गहरे प्रभावित किया। अब नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के बीच सरकार ने नेताओं और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा श्रेणियों में बदलाव किया है।

जानकारी के मुताबिक, प्रदेश के 116 नेताओं की सुरक्षा श्रेणी में कटौती की गई है। इनमें कुछ नेताओं को Z+ से Z और कुछ को Z से Y श्रेणी में किया गया है। भाजपा और कांग्रेस के नौ नेताओं की Z+ सुरक्षा घटाकर Z श्रेणी में कर दी गई है। वन मंत्री केदार कश्यप, पूर्व मंत्री महेश गागड़ा, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज और पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा की सुरक्षा में भी बदलाव किया गया है। इसके अलावा बस्तर के सांसदों, विधायकों और पूर्व मंत्रियों की सुरक्षा श्रेणियों की भी समीक्षा की गई है।

सुरक्षा श्रेणी में बदलाव का असर सुरक्षाकर्मियों की तैनाती पर भी पड़ेगा। सामान्य तौर पर Z+ सुरक्षा में करीब 55 सुरक्षाकर्मी और Z श्रेणी में लगभग 22 सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं। इस लिहाज से Z+ से Z श्रेणी में आने पर करीब 33 सुरक्षाकर्मियों की संख्या कम हो सकती है। हालांकि, वास्तविक तैनाती संबंधित व्यक्ति के खतरे के आकलन और सुरक्षा जरूरतों के आधार पर तय होती है। सुरक्षा में लगे जवानों को अब अन्य पुलिसिंग और सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारियों में लगाया जा सकेगा।

बस्तर में नेताओं की सुरक्षा का इतिहास झीरम घाटी हमले से गहराई से जुड़ा है। 25 मई 2013 को परिवर्तन यात्रा के दौरान नक्सलियों ने कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हमला किया था। इस घटना में बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा, तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल और वरिष्ठ नेता उदय मुदलियार समेत कई लोगों की जान चली गई थी। इस हमले के बाद महेंद्र कर्मा के परिवार की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आईं और परिवार के सदस्यों को Z+ सुरक्षा प्रदान की गई।

नक्सली हिंसा का निशाना केवल बड़े नेता ही नहीं बने। गांवों में चुनाव लड़ने वाले सरपंच, पूर्व सरपंच और जनपद एवं जिला पंचायत के जनप्रतिनिधि भी नक्सलियों के निशाने पर रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, चार दशकों में बस्तर में 100 से अधिक जनप्रतिनिधियों की नक्सली हिंसा में हत्या हुई है। वहीं, वर्ष 2001 से 2023 के बीच छत्तीसगढ़ में अलग-अलग राजनीतिक हैसियत वाले 118 नेताओं की हत्या का आंकड़ा भी सामने आया है। इन घटनाओं के चलते कई जनप्रतिनिधियों को लंबे समय तक सुरक्षा घेरे में रहना पड़ा।

9 अप्रैल 2019 को दंतेवाड़ा के तत्कालीन भाजपा विधायक भीमा मंडावी के काफिले पर नक्सलियों ने आईईडी विस्फोट से हमला किया था। इस घटना में भीमा मंडावी और उनके सुरक्षा कर्मियों की मौत हो गई थी। इसके बाद भी अलग-अलग क्षेत्रों में भाजपा नेताओं, पूर्व जनप्रतिनिधियों और पंचायत प्रतिनिधियों की हत्या की घटनाएं सामने आती रहीं। ऐसे हालात में नेताओं और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा पुलिस और प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बनी रही।

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, बस्तर में 250 से अधिक संरक्षित व्यक्तियों की सुरक्षा में एक हजार से ज्यादा जवान तैनात हैं। सुरक्षा श्रेणियों में बदलाव के बाद इन जवानों को दूसरी जिम्मेदारियों में लगाने की तैयारी है। बताया गया है कि सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव से पहले छह महीने तक हालात की समीक्षा की। आगे भी खतरे का आकलन जारी रहेगा और जरूरत के मुताबिक सुरक्षा में दोबारा बदलाव किया जा सकता है।

बस्तर में नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के बाद सुरक्षा व्यवस्था का पुनर्गठन एक अहम कदम माना जा रहा है। हालांकि, अंदरूनी इलाकों में सक्रिय जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा को लेकर सतर्कता बनाए रखना भी जरूरी है। झीरम घाटी और भीमा मंडावी हत्याकांड जैसी घटनाएं बताती हैं कि क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियों के साथ सुरक्षा का सवाल कितना महत्वपूर्ण रहा है। अब चुनौती यह है कि बदले हुए हालात में पुलिस संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो और जनप्रतिनिधि बिना भय के ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच सकें।


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