Chhattisgarh Latest News: बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जांच और साक्ष्यों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि नक्सल प्रभावित इलाकों में हर जगह और हर समय स्वतंत्र गवाह मिलना व्यावहारिक नहीं होता। ऐसे मामलों में यदि पुलिस अधिकारियों की गवाही विश्वसनीय और भरोसेमंद हो, तो केवल उसी के आधार पर भी आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर किसी गवाह के बयान को खारिज नहीं किया जा सकता कि वह पुलिसकर्मी है। इस टिप्पणी के साथ अदालत ने प्रतिबंधित माओवादी संगठन से जुड़े आरोपी मीनू कालमु उर्फ देंगा की अपील खारिज करते हुए उसकी 10 वर्ष की कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा।
बीजापुर में हुई थी कार्रवाई
मामला बीजापुर जिले के भैरमगढ़ थाना क्षेत्र का है। 14 अप्रैल 2023 को पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली थी कि प्रतिबंधित माओवादी संगठन के सदस्य पुलिस दल को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से विस्फोटक सामग्री लेकर जा रहे हैं। सूचना के आधार पर पुलिस ने फुल्लोड गांव के पास घेराबंदी की। पुलिस को देखते ही कुछ लोग जंगल की ओर भाग गए, जबकि मीनू कालमु उर्फ देंगा को मौके पर गिरफ्तार कर लिया गया। उसके चार साथी फरार हो गए।
तलाशी के दौरान आरोपी की जेब से एक इलेक्ट्रिक डेटोनेटर बरामद हुआ। बाद में उसकी निशानदेही पर खेत से एक चाकू और विस्फोटक सामग्री से भरा बैग भी जब्त किया गया।
NIA कोर्ट ने सुनाई थी 10 साल की सजा
दंतेवाड़ा स्थित एनआईए की विशेष अदालत ने सितंबर 2025 में आरोपी को विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 और 5 के तहत दोषी करार देते हुए 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपी ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अपील दायर की।
बचाव पक्ष ने रखी ये दलील
आरोपी की ओर से कहा गया कि मामले का एकमात्र स्वतंत्र गवाह अदालत में अपने बयान से मुकर गया था। पूरी कार्रवाई केवल पुलिस अधिकारियों के बयानों पर आधारित है, इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ मिलना चाहिए। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि कथित विस्फोटक खेत से बरामद हुआ था, इसलिए आरोपी की संलिप्तता साबित नहीं होती।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि प्रत्येक मामले में स्वतंत्र गवाह की उपस्थिति अनिवार्य नहीं है। विशेष रूप से नक्सल प्रभावित और घने जंगलों वाले क्षेत्रों में पुलिस को अक्सर खुफिया सूचनाओं के आधार पर कार्रवाई करनी पड़ती है। ऐसे में स्वतंत्र गवाह नहीं मिलने मात्र से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं हो जाता।
अदालत ने पाया कि पुलिस अधिकारियों की गवाही में कोई महत्वपूर्ण विरोधाभास नहीं है और उनके बयान पूरी तरह विश्वसनीय हैं। साथ ही आरोपी यह भी स्पष्ट नहीं कर सका कि उसके पास से बरामद इलेक्ट्रिक डेटोनेटर उसके कब्जे में कैसे आया। इन सभी तथ्यों को देखते हुए डिवीजन बेंच ने आरोपी की अपील खारिज कर दी और निचली अदालत द्वारा सुनाई गई 10 वर्ष की सजा को बरकरार रखा।

