Bastar Dussehra 2026: मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को बस्तर दशहरा में शामिल होने का न्योता, 75 दिनों तक चलता है विश्व प्रसिद्ध पर्व

Bastar Dussehra 2026: मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को बस्तर दशहरा में शामिल होने का न्योता, 75 दिनों तक चलता है विश्व प्रसिद्ध पर्व

Bastar Dussehra 2026: रायपुर: छत्तीसगढ़ के विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व-2026 में शामिल होने के लिए बस्तर दशहरा समिति, जगदलपुर के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को आमंत्रित किया है। बस्तर सांसद महेश कश्यप के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने राजधानी रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में मुख्यमंत्री से सौजन्य मुलाकात की। इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने बस्तर की जनजातीय परंपरा के अनुरूप मुख्यमंत्री को पारंपरिक पागा पहनाकर सम्मानित किया।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आमंत्रण के लिए प्रतिनिधिमंडल का आभार व्यक्त करते हुए बस्तर दशहरा के सफल आयोजन की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि बस्तर की सदियों पुरानी आस्था, समृद्ध जनजातीय संस्कृति और सामूहिक सहभागिता की अनुपम विरासत है। राज्य सरकार इस सांस्कृतिक धरोहर और जनजातीय परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए प्रतिबद्ध है।

75 दिनों तक चलता है बस्तर दशहरा का पर्व

प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री को बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, धार्मिक अनुष्ठानों और इस वर्ष के आयोजन की तैयारियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बस्तर दशहरा लगभग 75 दिनों तक चलने वाला विशिष्ट सांस्कृतिक और धार्मिक पर्व है। इसकी पारंपरिक शुरुआत हरेली अमावस्या से होती है और विभिन्न पूजा-विधानों एवं अनुष्ठानों के साथ यह पर्व आश्विन शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तक चलता है।

इस वर्ष 12 अगस्त को पाटजात्रा पूजा विधान के साथ बस्तर दशहरा का शुभारंभ हुआ। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, 10 अक्टूबर को काछनगादी पूजा, 18 अक्टूबर को बेल पूजा और 23 अक्टूबर को मुरिया दरबार का आयोजन किया जाएगा। पर्व के विभिन्न अनुष्ठानों में बस्तर अंचल के अलग-अलग समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

मां दंतेश्वरी की आराधना है पर्व की प्रमुख विशेषता

बस्तर दशहरा देश के अन्य दशहरा आयोजनों से अपनी विशिष्ट परंपराओं के कारण अलग पहचान रखता है। यहां दशहरा भगवान श्रीराम की रावण पर विजय के उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि बस्तर अंचल की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की पूजा और आराधना के महापर्व के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व की ऐतिहासिक परंपरा चालुक्य नरेश पुरुषोत्तम देव से भी जुड़ी हुई है। मान्यता है कि पुरुषोत्तम देव को पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर की यात्रा के दौरान ‘रथपति’ की उपाधि प्राप्त हुई थी। इसी ऐतिहासिक परंपरा के चलते बस्तर दशहरा में रथ का विशेष महत्व है।

जनजातीय समुदायों की सामूहिक भागीदारी है खास पहचान

बस्तर दशहरा में मांझी, चालकी, मेम्बर-मेम्बरीन सहित विभिन्न समुदायों और समाज के अलग-अलग वर्गों की जिम्मेदारियां परंपरागत रूप से निर्धारित हैं। धार्मिक अनुष्ठानों से लेकर रथ निर्माण और आयोजन की व्यवस्थाओं तक स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी रहती है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही यह परंपरा बस्तर दशहरा को सामाजिक एकता, सामूहिक सहभागिता और सांस्कृतिक समन्वय का अनूठा उदाहरण बनाती है। इस पर्व के माध्यम से बस्तर की विशिष्ट जनजातीय संस्कृति और परंपराएं नई पीढ़ी तक पहुंचती हैं।

देश-दुनिया के श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है पर्व

विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा अपनी भव्य रथयात्रा, विशिष्ट पूजा-अनुष्ठानों और जीवंत लोक संस्कृति के कारण देश-विदेश के श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है। हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग इस ऐतिहासिक पर्व को करीब से देखने और बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को जानने के लिए पहुंचते हैं। यह आयोजन बस्तर की लोक कला, परंपराओं और पर्यटन को व्यापक पहचान दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विभिन्न समुदायों की भागीदारी और मां दंतेश्वरी के प्रति गहरी आस्था इस पर्व को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करती है।

बस्तर की सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण जरूरी: मुख्यमंत्री साय

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि बस्तर की संस्कृति छत्तीसगढ़ की अमूल्य धरोहर है। बस्तर दशहरा जैसी परंपराएं लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ती हैं और नई पीढ़ी को समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराती हैं।

उन्होंने कहा कि इन परंपराओं का संरक्षण करना और उन्हें देश-दुनिया तक पहुंचाना सभी की साझा जिम्मेदारी है। मुख्यमंत्री ने बस्तर दशहरा के सफल आयोजन के लिए शुभकामनाएं देते हुए इस पर्व को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।


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