उर्दू शायरी शेयर करना अपराध नहीं, हाई कोर्ट ने शिक्षक पर दर्ज तीन FIR की निरस्त

उर्दू शायरी शेयर करना अपराध नहीं, हाई कोर्ट ने शिक्षक पर दर्ज तीन FIR की निरस्त

Jabalpur Latest News: जबलपुर। हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति बीपी शर्मा की एकलपीठ ने बैतूल निवासी शासकीय शिक्षक फैजान अंसारी को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में साफ किया कि वाट्सएप स्टेट्स में उर्दू शायरी शेयर करना कोई अपराध नहीं है।

उर्दू शायरी और कविता साझा करने से संबंधित था
याचिकाकर्ता के विरुद्ध दर्ज तीन एफआइआर निरस्त करने का राहतकारी आदेश पारित किया जाता है। यह मामला शिक्षक द्वारा अपने वाट्सअप स्टेटस पर उर्दू शायरी और कविता साझा करने से संबंधित था।

कई धाराओं में अपराध पंजीबद्ध कर लिया था
दरअसल, यह मामला उस समय सामने आया जब शिक्षक ने अपने वाट्सअप स्टेटस पर कुछ उर्दू शायरी और सामाजिक मुद्दों से जुड़ी बातें साझा की थीं। इसके बाद उनके विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई गई और पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 153(2) सहित कई धाराओं में अपराध पंजीबद्ध कर लिया था।

सामाजिक सद्भाव बिगड़ सकता है
आरोप लगाया कि पोस्ट से सामाजिक सद्भाव बिगड़ सकता है और अलग-अलग समुदायों के बीच तनाव पैदा हो सकता है। शिकायत के बाद पुलिस ने शिक्षक का मोबाइल भी जब्त कर लिया था और उनसे पूछताछ की गई थी।

जांच के दौरान ऐसा कोई स्पष्ट सबूत सामने नहीं आया
पोस्ट में इतिहास, बलिदान और सामाजिक अन्याय जैसे मुद्दों का जिक्र था। हालांकि जांच के दौरान ऐसा कोई स्पष्ट सबूत सामने नहीं आया जिससे सिद्ध हो सके कि शिक्षक का उद्देश्य किसी समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाना था।

सामाजिक अशांति पैदा करने का कोई इरादा नहीं था
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया कि उन्होंने सिर्फ साहित्यिक और भावनात्मक अभिव्यक्ति के तौर पर शायरी साझा की थी। उनका किसी को भड़काने, हिंसा फैलाने या सामाजिक अशांति पैदा करने का कोई इरादा नहीं था।

अपराध मानना अभिव्यक्ति की आजादी के सर्वथा विरुद्ध
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि महज उर्दू शायरी पोस्ट करने को अपराध मानना अभिव्यक्ति की आजादी के सर्वथा विरुद्ध है। वहीं राज्य शासन की ओर से दलील दी गई कि इंटरनेट मीडिया पर साझा की गई सामग्री का असर व्यापक हो सकता है, इसलिए मामले की जांच जरूरी थी।

आरोपों को समर्थन देने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं
कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि एफआइआर में लगाए गए आरोपों को समर्थन देने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि किसी पोस्ट को अपराध मानने के लिए यह साबित होना जरूरी है कि उसमें जानबूझकर नफरत फैलाने या हिंसा भड़काने की मंशा थी। सिर्फ साहित्यिक या भावनात्मक अभिव्यक्ति को आपराधिक दायरे में नहीं लाया जा सकता।

ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जिससे दुश्मनी पैदा करने की कोशिश की
अदालत ने कहा कि रिकार्ड पर ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जिससे लगे कि शिक्षक ने अलग-अलग समूहों के बीच दुश्मनी पैदा करने की कोशिश की। कोर्ट ने यह भी कहा कि इंटरनेट मीडिया पर पोस्ट की गई हर बात को अपराध नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब उसमें स्पष्ट रूप से हिंसा या नफरत फैलाने की अपील न हो। इसके बाद हाई कोर्ट ने शिक्षक के विरुद्ध दर्ज तीनों एफआईआर निरस्त कर दीं। इस आदेश को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और साहित्यिक अभिव्यक्ति के अधिकार के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


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