गरियाबंद जिले में मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान राशि को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया और वॉट्सऐप पर तेजी से वायरल हो रही एक सूची में 557 हितग्राहियों को लगभग 33 लाख 50 हजार रुपए वितरित किए जाने का दावा किया गया है। बताया जा रहा है कि यह सूची कलेक्टर कार्यालय से जारी पत्रों से संबंधित है, जिसके चलते मामले की गंभीरता और भी बढ़ गई है और पूरे जिले में हड़कंप की स्थिति बन गई है।
वायरल सूची को लेकर सबसे गंभीर आरोप यह लगाए जा रहे हैं कि इसमें आर्थिक रूप से सक्षम लोगों को भी स्वेच्छानुदान राशि का लाभ दिया गया है। आरोपों के अनुसार करोड़पति व्यापारी, बड़े किसान, राजनीतिक दलों से जुड़े पदाधिकारी, जनप्रतिनिधि और यहां तक कि शासकीय कर्मचारियों से संबंधित व्यक्तियों के नाम भी इस सूची में शामिल हैं। दावा किया जा रहा है कि जिन लोगों के पास पहले से ही पर्याप्त संसाधन, मकान, व्यवसाय और आय के साधन हैं, उन्हें भी इस योजना का लाभ दिया गया, जबकि वास्तविक जरूरतमंद इससे वंचित रह गए।
सूची में सामने आए तथ्यों ने विवाद को और गहरा कर दिया है। आरोप है कि कुछ व्यक्तियों को एक ही दिनांक में दो-दो बार राशि जारी की गई, वहीं कुछ नाम ऐसे भी बताए जा रहे हैं जिन्हें लगातार तीन वर्षों से इस योजना का लाभ मिलता आ रहा है। अनिता सिन्हा, रेखा यदु, डॉ. हरिश हरित, रामप्रसाद शांडिल्य, धर्मेंद्र चंद्राकर, सुमीत पारख, दिनेश सचदेव और रूपनाथ बंजारे जैसे नाम सामने आने के बाद मामला और अधिक सुर्खियों में आ गया है तथा पारदर्शिता को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
इस पूरे मामले में छुरा निवासी गणेश सिन्हा का उदाहरण मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने वाला है। ब्रेन हेमरेज जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे गणेश सिन्हा आर्थिक तंगी के कारण इलाज कराने में असमर्थ हैं। उन्होंने स्थानीय विधायक रोहित साहू के माध्यम से सहायता की गुहार लगाई थी, लेकिन अब तक उन्हें कोई आर्थिक मदद नहीं मिल पाई है, जिससे व्यवस्था पर और सवाल खड़े हो रहे हैं।
नियमों के अनुसार मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान राशि का उद्देश्य केवल आर्थिक रूप से कमजोर, गंभीर बीमारी या आपात स्थिति से जूझ रहे लोगों को सहायता प्रदान करना है। आमतौर पर आयकरदाता, शासकीय कर्मचारी और आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग इस योजना के पात्र नहीं होते। ऐसे में यदि वायरल सूची में किए जा रहे दावे सही साबित होते हैं, तो यह नियमों की अनदेखी और प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही का मामला बन सकता है।
मामले में तहसीलदार मयंक अग्रवाल ने कहा है कि संबंधित जानकारी कलेक्टर कार्यालय से प्राप्त की जानी चाहिए, क्योंकि पत्र वहीं से जारी हुआ है। फिलहाल प्रशासन की ओर से इस सूची की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है और लोगों की नजरें अब प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।

