रायपुर स्थित सुभाषचंद्र बोस राज्य पुलिस अकादमी, चंद्रखुरी में आयोजित एक व्याख्यान के दौरान अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष एवं नेत्र विशेषज्ञ डॉ. दिनेश मिश्र ने समाज में फैले अंधविश्वास और कुरीतियों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि डायन या टोनही के संदेह में महिलाओं को प्रताड़ित करना एक शर्मनाक और अमानवीय कृत्य है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक सोच और जागरूकता के अभाव में आज भी देश के कई हिस्सों में निर्दोष लोगों, विशेषकर महिलाओं, को अंधविश्वास का शिकार बनना पड़ता है।
डॉ. मिश्र ने बताया कि विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में निरंतर प्रगति के बावजूद समाज के एक बड़े वर्ग में जादू-टोना, तंत्र-मंत्र और झाड़-फूंक जैसी मान्यताएं गहराई से जमी हुई हैं, जिसके चलते महिलाओं को डायन या टोनही बताकर उनके साथ शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न किया जाता है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में वर्ष 2005 से टोनही प्रताड़ना निरोधक कानून लागू है, लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन और व्यापक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है, ताकि पीड़ितों को समय पर न्याय और राहत मिल सके।
उन्होंने प्रशिक्षु पुलिस अधिकारियों से अपील की कि ऐसे मामलों में शिकायत मिलते ही त्वरित और सख्त कार्रवाई करें, जिससे समाज में गलत संदेश न जाए और अपराधियों के मन में कानून का डर बना रहे। डॉ. मिश्र ने कहा कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास हमारे संविधान का महत्वपूर्ण हिस्सा है और यह तर्कशीलता, विवेकपूर्ण निर्णय और सत्य की खोज की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है।
व्याख्यान के दौरान उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित अंधविश्वासों का उल्लेख करते हुए कहा कि बीमारियों और प्राकृतिक आपदाओं के कारणों को समझने के बजाय लोग अक्सर बैगा-गुनिया और झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं, जबकि हर समस्या का समाधान वैज्ञानिक और चिकित्सकीय दृष्टिकोण से ही संभव है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे किसी मशीन के खराब होने पर उसे ठीक कराने के लिए विशेषज्ञ की आवश्यकता होती है, वैसे ही शरीर की बीमारियों के इलाज के लिए प्रशिक्षित डॉक्टरों से ही संपर्क करना चाहिए।
डॉ. मिश्र ने बताया कि देश के कई राज्यों में आज भी डायन या टोनही के संदेह में महिलाओं के साथ अत्याचार, सामाजिक बहिष्कार और यहां तक कि हत्याओं जैसी घटनाएं सामने आती हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 2001 से 2015 के बीच हजारों महिलाओं की मौत ऐसे मामलों में दर्ज की गई है, जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि कई मामलों में शिकायत दर्ज ही नहीं हो पाती।
उन्होंने यह भी कहा कि तथाकथित चमत्कारों और झाड़-फूंक के नाम पर लोगों को भ्रमित कर ठगी की जाती है, जबकि इन तथाकथित चमत्कारों के पीछे साधारण वैज्ञानिक प्रक्रियाएं या हाथ की सफाई होती है। भूत-प्रेत जैसी मान्यताओं को उन्होंने पूरी तरह निराधार बताते हुए कहा कि इनके पीछे अक्सर मानसिक भ्रम, अज्ञानता या शरारती तत्वों की भूमिका होती है।
डॉ. मिश्र ने मीडिया और टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों पर भी चिंता जताई और कहा कि ऐसे कंटेंट का बच्चों और समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों के प्रसारण की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने अंत में कहा कि अंधविश्वास, पाखंड और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ लड़ाई केवल कानून के भरोसे नहीं लड़ी जा सकती, बल्कि इसके लिए समाज के हर व्यक्ति को जागरूक होकर आगे आना होगा। वैज्ञानिक सोच और तर्कशीलता को अपनाकर ही एक स्वस्थ और प्रगतिशील समाज का निर्माण संभव है।

