Jagdalpur News: भीतर रैनी और बाहरा रैनी की तैयारियां तेज, मगरमुही रस्म ने बस्तर दशहरा की सांस्कृतिक परंपरा को फिर किया जीवंत

Jagdalpur News: भीतर रैनी और बाहरा रैनी की तैयारियां तेज, मगरमुही रस्म ने बस्तर दशहरा की सांस्कृतिक परंपरा को फिर किया जीवंत

Chhattisgarh Jagdalpur News: जगदलपुर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा में परंपरा और आस्था के बीच मगरमुही रस्म विधि-विधान के साथ संपन्न हुई। आठ पहियों वाले विशाल विजय रथ के निर्माण में इस रस्म को महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। अनुष्ठान के दौरान खाती पुजारी ने पूजा-पाठ किया और परंपरा के अनुसार मांगुर मछली तथा बकरे की बलि दी गई। मान्यता है कि इस रस्म के संपन्न होने से रथ निर्माण का कार्य निर्विघ्न पूरा होता है।

मगरमुही रस्म के साथ ही विजय रथ के निर्माण की प्रक्रिया एक महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गई है। इस दौरान लकड़ी के आठ विशाल पहियों को आपस में जोड़ने के लिए बड़े-बड़े लकड़ी के हिस्सों का इस्तेमाल किया जाता है। इन्हीं हिस्सों के सहारे रथ का मजबूत ढांचा तैयार होता है, जिसे आधुनिक तकनीकी भाषा में चेचिस के समान माना जा सकता है।

बस्तर दशहरा की विशेषता है कि सदियों पुरानी इस परंपरा में आज भी स्थानीय कारीगर अपने पारंपरिक हुनर और अनुभव के आधार पर विशाल रथ तैयार करते हैं। आधुनिक मशीनों के बजाय पारंपरिक औजारों की मदद से रथ का निर्माण किया जाता है। इतने विशाल ढांचे को तैयार करने में कारीगरों की दक्षता, तकनीकी समझ और पीढ़ियों से चले आ रहे कौशल की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

आठ पहियों वाला यह विशाल विजय रथ आगे चलकर बस्तर दशहरा के प्रमुख आयोजनों भीतर रैनी और बाहरा रैनी में उपयोग किया जाता है। रथ निर्माण से जुड़ी प्रत्येक रस्म इस उत्सव की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का अहम हिस्सा है।

मगरमुही रस्म केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक तकनीक की पहचान भी है। पीढ़ियों से स्थानीय कारीगर इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए विजय रथ का निर्माण करते आ रहे हैं। रस्म पूरी होने के साथ ही रथ निर्माण की तैयारियों ने भी गति पकड़ ली है।


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