Deepak Baij Statement On Goverment सूरजपुर। दीपक बैज ने प्रतापपुर में आयोजित प्रवास कार्यक्रम के दौरान राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि जल, जंगल, जमीन और खनिज संपदा छत्तीसगढ़ की असली पहचान हैं, लेकिन वर्तमान सरकार इन्हें मनमाने तरीके से बेचने और दोहन करने में लगी है, जिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए दीपक बैज ने कहा कि छत्तीसगढ़ की बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा की रक्षा कैसे होगी, यह सरकार को स्पष्ट करना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार के संरक्षण में खनिज संपदा को नुकसान पहुंचाया जा रहा है और कांग्रेस इसे रोकने के लिए लगातार संघर्ष करेगी।
बैज ने कहा कि संगठन सृजन कार्यक्रम के तहत “गांव चलो अभियान” के माध्यम से कांग्रेस पूरे प्रदेश में संगठन को मजबूत कर रही है। इसके तहत 27 हजार बूथ और 15 हजार पंचायत कमेटियों का गठन किया जा रहा है, जिसकी निगरानी स्वयं पार्टी नेतृत्व कर रहा है। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य 2028 विधानसभा चुनाव में मजबूत राजनीतिक मुकाबला तैयार करना है।
सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा शासन में छत्तीसगढ़, जिसे पहले “धान का कटोरा” कहा जाता था, अब “नशे का कटोरा” बनता जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में शराब दुकानों के संचालन के साथ-साथ गांजा, अवैध शराब और नशीले पदार्थों की बिक्री तेजी से बढ़ रही है। साथ ही कुछ जिलों में अफीम की खेती को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार अपने ही नेताओं पर कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति कर रही है और गंभीर मामलों में भी ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। धर्म स्वतंत्रता अधिनियम को लेकर बैज ने इसे भाजपा का राजनीतिक प्रोपेगेंडा बताया और कहा कि सरकार विकास के मुद्दों पर जनता से जवाब नहीं दे पा रही है, इसलिए समाज को विभाजित करने की राजनीति कर रही है।
गैस सिलेंडर की किल्लत को लेकर भी उन्होंने सरकार को घेरा और कहा कि जनता मूलभूत सुविधाओं के लिए परेशान है, लेकिन सरकार स्थिति को स्वीकार करने के बजाय भ्रम फैला रही है। उन्होंने दावा किया कि वर्तमान हालात में यदि चुनाव होते हैं तो जनता सरकार के खिलाफ मतदान करेगी।
इस बीच कार्यक्रम को लेकर स्थानीय स्तर पर असंतोष भी सामने आया, जहां कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं के शामिल न होने को लेकर सवाल उठे। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा रही कि कार्यक्रम में स्थानीय कार्यकर्ताओं की बजाय बाहरी लोगों की भागीदारी अधिक थी, जिससे संगठनात्मक असंतोष की स्थिति बनी।
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