Khairagarh News : नीम के पेड़ के नीचे विराजमान थे अष्टभुजी गणेश, मंदिर में ले जाने की कोशिश से जुड़ी है 25 युवकों की कहानी

Khairagarh News : नीम के पेड़ के नीचे विराजमान थे अष्टभुजी गणेश, मंदिर में ले जाने की कोशिश से जुड़ी है 25 युवकों की कहानी

Chhattisgarh Khairagarh News: खैरागढ़। राजनांदगांव-खैरागढ़ मार्ग पर ग्राम गोपालपुर में भगवान श्रीगणेश का एक ऐसा मंदिर है, जो अपनी अनोखी परंपराओं, स्थानीय इतिहास और वर्षों पुरानी आस्था से जुड़ी मान्यताओं के कारण खास पहचान रखता है। यहां भगवान गणेश की आठ भुजाओं वाली प्राचीन पाषाण प्रतिमा विराजमान है, जिसे ग्रामीण स्वयंभू स्वरूप मानते हैं। इस प्रतिमा से जुड़ी कई लोकमान्यताएं आज भी स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित हैं।

स्थानीय लोगों के अनुसार कभी यह प्रतिमा खुले आसमान के नीचे नीम के पेड़ के नीचे विराजमान थी। वर्ष 2006 में मंदिर निर्माण के दौरान इसे मंदिर के भीतर स्थापित करने का प्रयास किया गया। स्थानीय जानकार भागवतशरण सिंह के मुताबिक करीब 25 युवकों ने मिलकर प्रतिमा को उठाने की कोशिश की, लेकिन वह अपनी जगह से नहीं हिली। इसके बाद मंदिर के तत्कालीन सेवक को स्वप्न आने की बात सामने आई। स्थानीय मान्यता के अनुसार इसके बाद प्रतिमा को मंदिर में स्थापित किया जा सका। प्रतिमा के नहीं उठने का यह प्रसंग आज भी गोपालपुर में आस्था से जुड़ी लोककथा के रूप में बताया जाता है।

गोपालपुर और समीपस्थ सिंगारपुर का संबंध स्थानीय ऐतिहासिक परंपराओं में खैरागढ़ के राजवंशीय इतिहास से जोड़ा जाता है। स्थानीय जानकारी के अनुसार करीब 1700 के आसपास सिंगारपुर परगना खैरागढ़ से जुड़ा था और यह क्षेत्र राजा टिकैतराय के शासनकाल से संबंधित बताया जाता है। अष्टभुजी गणेश प्रतिमा को लेकर स्थानीय मान्यता है कि वर्ष 1884 में नागवंशी शासक उमराव सिंह के काल में इसकी स्थापना हुई थी। इसके बाद सूबेदार ठाकुर प्रकाश सिंह गहरवार और उनके वंशज प्रतिमा की सेवा-पूजा की परंपरा से जुड़े रहे। बटुक सिंह, तोप सिंह और युधिष्ठिर सिंह सहित उनके वंशजों के नाम भी इस परंपरा से जोड़े जाते हैं। स्थानीय स्तर पर इस वंशावली और राजवंशीय इतिहास का उल्लेख नागवंश कुलभूषण लाल प्रद्युम्न सिंह की पुस्तक ‘नागवंश’ में होने की बात कही जाती है।

गोपालपुर के अष्टभुजी गणेश मंदिर की सबसे अलग परंपराओं में से एक गणेश प्रतिमा का विसर्जन नहीं किया जाना है। यहां गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक 11 दिनों तक उत्सव मनाया जाता है, लेकिन अनंत चतुर्दशी के दिन प्रतिमा को विसर्जित करने के बजाय भगवान श्रीगणेश को दो बाल्टी पानी से स्नान कराया जाता है। पूजा-अर्चना के बाद इसी परंपरा के साथ गणेशोत्सव का समापन होता है। ग्रामीणों के अनुसार यहां पाषाण स्वरूप में विराजमान प्राचीन गणेश प्रतिमा की ही पूजा की जाती है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक एक बार गणेश चतुर्थी के अवसर पर यहां मिट्टी की गणेश प्रतिमा स्थापित की गई थी। इसके बाद संबंधित महिला की मृत्यु हो गई। ग्रामीणों ने इस घटना को अपनी धार्मिक मान्यता से जोड़कर देखा और इसके बाद यहां मिट्टी की गणेश प्रतिमा स्थापित नहीं करने की परंपरा और मजबूत हो गई। हालांकि यह घटना स्थानीय लोकमान्यता का हिस्सा है और इसके पीछे किसी ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण का दावा नहीं किया जा रहा है।

प्रतिमा को लेकर एक और मान्यता सिंगारपुर ले जाने के प्रयास से जुड़ी है। ग्रामीणों के अनुसार एक समय अष्टभुजी गणेश प्रतिमा को सिंगारपुर ले जाने की कोशिश की गई थी। इसके लिए प्रतिमा को बैलगाड़ी में रखने का प्रयास किया गया, लेकिन स्थानीय मान्यता के अनुसार प्रतिमा बैलगाड़ी में रखी ही नहीं जा सकी। इसके बाद उसे वहीं रहने दिया गया। आज भी मंदिर में इसी प्राचीन अष्टभुजी गणेश प्रतिमा की पूजा की जाती है।

गोपालपुर का अष्टभुजी गणेश मंदिर धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय इतिहास और लोकपरंपराओं के मेल के कारण अलग पहचान रखता है। करीब 1700 से जुड़े सिंगारपुर और खैरागढ़ के ऐतिहासिक संदर्भ, वर्ष 1884 में प्रतिमा स्थापना की स्थानीय मान्यता, आठ भुजाओं वाला पाषाण स्वरूप, वर्ष 2006 में 25 युवकों द्वारा प्रतिमा उठाने की कोशिश का प्रसंग और अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन के बजाय स्नान कराने की परंपरा इस मंदिर को विशेष बनाती है।

इनमें से कई प्रसंग स्थानीय मान्यताओं और मौखिक परंपराओं पर आधारित हैं। इनके ऐतिहासिक पक्ष की पुष्टि के लिए प्राथमिक दस्तावेजों और पुरातात्विक प्रमाणों का अध्ययन अलग विषय है। हालांकि स्थानीय लोगों के लिए गोपालपुर का अष्टभुजी गणेश मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और परंपरा का जीवंत केंद्र है।


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