Chhattisgarh Raipur News : रायपुर। राजधानी के सबसे बड़े आंबेडकर अस्पताल में डॉक्टरों की कमी एक बार फिर सामने आई है। अस्पताल प्रबंधन ने असिस्टेंट प्रोफेसर, सीनियर रेजिडेंट और जूनियर रेजिडेंट के कुल 135 पदों पर संविदा भर्ती के लिए वाक-इन-इंटरव्यू आयोजित किया था, लेकिन भर्ती प्रक्रिया में केवल छह डॉक्टर ही शामिल हुए। इनमें से पांच का चयन हुआ, जबकि 130 पद अब भी खाली रह गए हैं।
चयनित डॉक्टरों में स्किन, रेडियोथेरेपी, आर्थोपेडिक्स, मेडिसिन और सर्जरी विभाग के चिकित्सक शामिल हैं। इतनी बड़ी संख्या में पद खाली रहने से अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी और मरीजों के इलाज पर पड़ने वाले संभावित असर को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
जानकारों के मुताबिक, डॉक्टरों के संविदा पदों में रुचि नहीं लेने के पीछे कई कारण हैं। जेडीए अध्यक्ष डॉ. पीयूष श्रीवास्तव के अनुसार, संविदा नियुक्ति में नियमित कर्मचारियों की तरह पेंशन, पीएफ और अन्य सामाजिक सुरक्षा के लाभ नहीं मिलते। लंबे समय तक सेवा देने के बावजूद प्रमोशन और नियमित वेतन वृद्धि जैसी सुविधाएं भी सीमित रहती हैं।
वहीं, एमडी और एमएस जैसी विशेषज्ञता रखने वाले डॉक्टरों को निजी अस्पतालों में इससे बेहतर पैकेज और काम करने की अधिक स्वतंत्रता मिल रही है। बताया जा रहा है कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में मिलने वाले संविदा मानदेय की तुलना में बाहर करीब तीन गुना तक वेतन और बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हैं। ऐसे में डॉक्टर संविदा पदों के बजाय निजी क्षेत्र को प्राथमिकता दे रहे हैं।
डॉक्टरों और फैकल्टी की कमी का असर केवल अस्पताल की व्यवस्थाओं तक सीमित नहीं है। मेडिकल कॉलेजों में पर्याप्त शिक्षक और सीनियर रेजिडेंट नहीं होने पर नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) की मान्यता और पीजी सीटों पर भी असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक पद खाली रहने की स्थिति में पीजी सीटों में कटौती या निलंबन का खतरा बना रहता है।
ऐसे में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में नियमित भर्ती प्रक्रिया शुरू करने, संविदा डॉक्टरों के वेतन और सुविधाओं में सुधार करने तथा बेहतर कार्य वातावरण उपलब्ध कराने की जरूरत बताई जा रही है। डॉक्टरों की कमी दूर किए बिना मेडिकल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता बनाए रखना बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

